Tuesday, 9 January 2024

कंक्रीट

 सीधी-सादी बात भी गुम जाती हैं कंक्रीट के शहरों में अब 

मनस्वी... ग़ज़ल क्या समझेंगे यहाँ , पत्थर बने इंसान सब ..              

 

©® मनस्वी                      

Wednesday, 20 September 2023


 आज फिर ◆◆◆◆◆

आज फिर ... मन भर आया 

चली मैं , तुम संग

बन हरियाली छाया

हाँ.... तुम ही तो हो

जो वर्षों से मुझे 

देते आये संबल

कभी अपनी काया से 

कभी मीठी छाया से

छिपा अपने आगोश में ...

पोंछ मेरे आंसू 

अपनी आर्द्रता से

मेरे सूखे मन को

हल्के से सहला देते

और.. और.. मैं...सुबक उठती 

तुम्हारी हरित कांति में

फिर ..फिर..

तुम धुंध की गहरी चादर में

मानो ... छुपा देते मुझे 

प्रकृति की चादर में

तत्पश्चात ....

प्रकृति की कोख से

पुनर्जीवित सी ' मैं '

'मनस्वी ' ....

खिल उठती नवजीवन पा 

दुआ को उठते हाथ ज्यूँ

मुस्कुराने लगते पात यूँ.... ©®मनस्वी


Monday, 11 September 2023

सीख

 सीख 

वक्त बुरा , हाल बेहाल हैं देखो तो आज इंसान का 

पहाड़ दरक रहे , जमीं फट रही , हर तरफ आलम पुकार का

अलग-अलग हैं जगह सभी ,फिर भी जुड़ रहा रिश्ता दर्द का

बादल की गर्जन से आज , इंसानी चेहरा भी हैं भीगा सर्द सा 

सांझ ढल रही , फिर भी आसमां में कहीं आसदीप हैं चांद सा

मनस्वी ..निशा के बाद अब होगा, भोर उजला शांत सा 

ए मानव !मत घबरा सीख ले बस !आशियाना नया बसा 

प्रेम कर प्रकृति से , ना फाड़ उसका सीना , ना ही उसमे समा 

सृष्टा हैं वो , दृष्टा भी , तुझमें भी हैं समाया , ना तुझसे हैं जुदा 

मनस्वी .. मत भूल उसे , कर वंदन, वही ईश हैं वही खुदा ।।

©® मनस्वी 


Sunday, 10 September 2023

भाव

 कुछ तो है जो रज़ा बन बह रहा है हममें

मनस्वी .. 

नहीं तो भाव शब्दों से हम खेला नहीं करते 


आँखे

 

मुद्दत हो गयी थी आँखें भीगी न थी...
मनस्वी .. अब के जो भीगी , तो समुन्दर बन गयी

शब्द आज कहीं खो से गये है

मन के भंवर में सो से गये है

मनस्वी............

पल पल हंसाती रहती है जिंदगी

मगर हम हँसते हँसते रो पड़े है 


एतबार

 कुछ तो किरच है अभी दरमियाँ हमारे

मनस्वी .. यूँ ही तो एतबार की ये इंतिहाँ न होती 😇


Sunday, 9 August 2020

जिंदगी

 ✍️✍️ ☺️

हिसाब न रखो ज़िन्दगी की किताब का

मनस्वी..

हर सफा , इसका सकूं दें जरूरी तो नहीं😊😊 ©®

Tuesday, 3 December 2019

दर्द

दर्द
है दर्द में डूबा हर शब्द हमारा
अब तो है हमें बस इन्ही का सहारा
रोयेगा जब भी ये दिल हमारा
उतारेंगे कागज़ पर हम दर्द सारा
गरजते है बादल तो बरसती है आँखे
चुभते है दिल में फिर यादों के काँटे
समय की धारा तो बहती रहेगी
कुछ न कुछ हमसे वो कहती रहेगी
मगर दर्द दिल का तो बढ़ता ही जायेगा
कागज़ को यूं ही वो रंगता ही जायेगा
फिर एक दिन *मनस्वी*ऐसा भी आएगा
जब दर्द ये हमें इस जहाँ से ले जाएगा
उस दिन का है हमें अब इतना इंतज़ार
कि,, ख्याल एक यही अब आता है बार बार
ऐ खुदा ! हमारी वफ़ा का कुछ सिला दे
इस दर्द से हमें अब तू मुक्ति दिला दे ,,,
टिप्पणी ~~ एक नारी की व्यथा गाथा जिससे उसकी व्यथित मनोदशा का पता चलता है कि कोई इंसान नहीं है जो उसको समझ सके सिवाय उसकी डायरी के जो उसके दर्द की हमनवाज़ है।
मीनाक्षी कपूर मीनू (मनस्वी)

Monday, 2 December 2019

खामोश सदाएं

खामोशी की हद न पूछो हमसे मनस्वी
ये वो सदायें है जो बोली नहीं जाती
तन्हा मन की आवाज़ खामोश है मनस्वी
क्योंकि तन्हाई गुनगुनायी नहीं जाती
सरहद पार से भी सदायें आती है मनस्वी
बस अब सबको सुनाई नहीं जाती

Wednesday, 27 November 2019

बस यूं ही कभी कभी बारिश की बूंदों से भीगते मन शब्द ..😊💦💦
भीग जाते हैं आंखों के कोने भी हल्के से कभी
मनस्वी , ये अलग बात है कि 
इन्हें देख नहीं पाते है सभी
ओस सा भीग जाता है मन भी कभी
ये अलग बात है कि 
फिसलने वाले को भी बचा नहीं पाते है सभी
समझने समझाने की उलझन को कौन आज समझे
मनस्वी, बस सब समझ कर भी 
दिल को न समझ पाते है सभी....

Tuesday, 26 November 2019

आसदीप
**********
तबियत नासाज़ है
मन है
भीगा भीगा सा
खामोश है समां
चरमराहट है पतों की
कहीं किसी शाख पर
निकली है कोंपल
देख उसे यूँ लगा
आगाज़ है
नवजीवन की...
ढलती शाम
मिलन निशा का
फिर
सुस्वागत
भोर किरण का
मनस्वी....
आसदीप बस यूं ही
जला कर रखना
प्रकृति
संग तनमन भी
स्वयं बचा कर रखना.....
मीनाक्षी कपूर मीनू (मनस्वी )




Saturday, 22 September 2018

मुस्कुराती आँखों में  अब नमी सी है
मनस्वी-खुश हूँ मगर कुछ कमी सी है
--------------------मीनू मनस्वी ----------------------------------

Thursday, 31 May 2018

कंकाल रूपी आदमियत

कंकाल रूपी आदमियत
---------------
देख तुझे यूँ
सहम सा गया ..
फिर अचानक
कुछ स्मृत कर
ठहर सा गया ..
कभी देखूं तुम्हे
तो कभी निहारूं
मैं खुद को..
मैं भी तो तू
आज हो नही गया..
क्यों डरूँ मैं
हाँ , क्यों डरूँ मैं तुमसे
मैं भी तू आज
तू भी तो मैं आज
हो सा गया ....
हाँ ,,, मनस्वी ,,, हाँ
बस नज़र गहराने
की देर है ,,,
फिर अंदर की
चमड़ी गलाने की
फिर क्यों डरूँ मैं
हाँ ,क्यों डरूँ मैं
मैं अब तू ,,
तू मैं हो गया
सबकी नजर
पारखी नज़र
घर संसार में
दुनियादारी में
पिसता मैं ^आदमी^
आज कंकाल सा
हो तो गया ...    ( मनस्वी )
मीनाक्षी कपूर मीनू ।सर्वाधिकार सुरक्षित है।
टिप्पणी ...आज का मानव अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी बहुत से अभावो में , प्रभावों में और मुश्किलो से गुज़ार रहा है कि चाहे अमीर हो या गरीब सबकी अपनी अपनी दोहरी ज़िंदगी है जो कहीं उसकी असलियत को कोट पैंट में तो कहीं सादा कपडों में ढकने की कोशिश करती है और कामयाब भी होती है लेकिन इस मानव मन का क्या करें वह दूसरों से तो ढके मगर खुद की नज़रों से कैसे बचें जो उसे देख रही है कंकाल की शक्ल में गलता सड़ता हुआ .. 😢  फिर भी है सभ्य शालीन मुस्कान से लिपटा हुआ ।

Saturday, 21 April 2018

फिर से वही छटपटाहट... वही अहसास ,,  भीतही सतह पर खरोंच ..रिसते घाव का अदृश्य उभार फिर उभर आया ... 
ज़िन्दगी की राह में चलते चलते कभी कभी कोई ऐसा क्षण आ जाता है जो यादों को कुरेद कर मन को आहत कर देता है और हम चाह कर भी खुद को उदास होने से रोक नहीं पाते । आज कही जब वैसा ही माहौल पाया अपनों से अपनों को बिछुड़ते पाया तो  ,,,,,,
आहत
''''''''''''':
बहुत आहत
हुआ मन ,,,,
देखा  जब
बातों ही बातों में
उड़ गए प्राण पखेरू
मिटटी हुआ तन
अचानक तेज़ झंझावात से
यूँ लगा ,,,,,,
बरसों से बंद
खिड़लिया कपाल हिलने लगे
ज़ोर ज़ोर से,,,,
और फिर मुड़ गया मन
भीतर की ओर
देखा वर्षों से चादर
तान सोई जड़ यादें
होने लगी  चेतन
यकायक ,,,,,
हाथ पकड़ किसी ने
खींच अपनी ओर
बदल दी मन की राह
और फिर चेतन अवचेतन
के बीच झूलता मन ,,,,,
बढ़ गया बाहर की ओर
मुस्कुराते हुए
फिर भी लगा
कही से चोर दृष्टि से
छुप के देख रही है
भिंची हुयी आँखे
तूफ़ान को जबर्दस्ती
रोकते हुए मानो ......
'मनस्वी ' .....
डबडबाहट को रोक
सैलाब को पी रही ,,,,,,,  :(
स्वरचित । सर्वाधिकार सुरक्षित है ।
मीनाक्षी कपूर मीनू ( मनस्वी )
एक अंश -धरा का
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
मैं ...
मैं जनित
हम...
और इसी हम से
आवर्तन
परावर्तन ,करके
बहुत आहत हुई
मैं ........
बड़ी -बड़ी शिलाएं
तम की ,
बाँध मुझ पर
दबा दिया इतना
कि मैं ,
मैं ना रही .....
बन गयी,
ऊसर ...
जो थी कभी
उपजाऊ ..
होती थी
प्रेम वृष्टि
लहलहाती थी ,
फसलें ...
हाँ --तब थी
तृप्ति ,भूख की ...
और आज ,
आज है सृष्टि ,
भूख की ..
बस
यही तो है आवर्तन ,
मन का -
जो आज काट मुझको
खा गए तुम ,
मैं ......आज
मैं ना रही ,
गल के खाक हो रही
मगर क्या ..?
इस तरह
तुम भी ना खो जाओगे ,
अन्ततः
दूँढोगे
एक पग
धरा का ' मनस्वी '
ना पाकर
खाक हो जाओगे ......' मनस्वी '
मीनाक्षी कपूर मीनू ।सर्वाधिकार सुरक्षित है ।

Wednesday, 18 April 2018

मन से ....
********
आँखों की नमी ने
हरफ़ कुछ लिख डाले 
मनस्वी ..
मन की आँखों से  
आ ....
ज़रा देख तो ले ... 
सकूं पा सकूँ तो
सुखा दूँ ...
इस नमी को भी 
मनस्वी .... . 
तू आ के 
ज़रा समेट तो ले ...
गुम गया वज़ूद .
छायाचित्र से हो गए
मनस्वी ..
आ ज़रा ..
इसे रूबरू होने तो दे .. 
स्वरचित ।सर्वाधिकार सुरक्षित है ।
मीनाक्षी कपूर मीनू (मनस्वी)

Monday, 29 May 2017

भूलना सीखो

भूलना सीखो
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''मानव क्या है ...? मानव जड़ से चेतन हुई भगवान की अनमोल कृति ....लेकिन भाबनावश मानव अपनी अमूल्यता को भुला कर इस अनमोल शरीर के साथ भावनाओं का खिलवाड़ कुछ इस तरह से करता है कि ..ईश्वर प्रदत यह अमूल्यता समय से पहले या तो नष्ट हो जाती है या शारीरिक अस्वस्थता ..हमारे जीवन को कष्टदायक बना देती है .......ये कष्ट ज्यादातर हमारी भावनाओं से जुड़े है ,,,अगर हम शरीर से ,मन से ,आचरण से ,स्वस्थ होना चाहते हैं तो अस्वस्थता की सारी बातें भूलनी पड़ेगी ..चिंताएं पाल कर नहीं रखे उन्हें अंदर से निकालना पड़ेगा ..तभी मन शांत होगा ...बड़े से बड़ा संकट ,दुःख का समय , जब हमारा कोई प्रियजन हमें तडफता छोड़ मृत्यु के मुख में समां गया हो तब भी हमें उन्हें भूलना पड़ेगा ,,,दुःख की ब चिंता की बातें छोड़ उनसे लड़ने की कोशिश हमें नई जिंदगी दे सकती है ...मानती हूँ बहुत मुश्किल है लेकिन असम्भव नहीं ...शुरू में बहुत कठिनाई होगी लेकिन धीरे धीरे हम कामयाब हो जायेंगे .. और मन जब विषाक्त बातों को भूलना सीख जायेगा ...तो तन खुदबखुद अस्वस्थता का त्याग कर देगा ....तन के स्वस्थ होते ही हम अपने मन से लड़ने को ओर ज्यादा सक्षम हो जायेंगे .....इसलिए ..भूलना सीखना बहुत जरुरी है ......मैं  मनस्वी ये आपसब को ही नहीं खुद को भी कह रही हूँ ...क्योंकि यही सत्य है ,,,,,,,,  मनस्वी ,....     :) 

Monday, 15 May 2017

माँ ---- मगर क्या सार्थक है ये शब्द आज सब के दिल में --- ????????
सृजनकारी शक्ति रूप अर्पणा नारी माँ बन अपने अंश की खुशी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करती तन-मन-धन ..........मगर हर पल हर रूप में अपने बच्चे का साथ देने वाली नारी इस युग में अंत वेला में तन्हा भटकती सुनने को तरसती है एक आवाज़ ..माँ ... माँ ......न जाने क्यों ... ?

माँ
"""""""""""
एक आह्लाद
बच्चे के तुतलाते
होठों से ...
निकला अस्फुट
शब्द रूप में
प्रथम .....
जीवन आलाप
मधुर सा
माँ ..............
थुपक-थुपक कर
नन्हें क़दमों को
शिक्षा की ओर
अग्रसर करती
अपने नैतिक
मूल्य निभाती
सखी सी माँ ...............
कर्मठता का
प्रतीक बन
पल-पल उसे
सह्लाती
देती सहारा
जीवन-पथ पर
स्नेहिल माँ ...............
प्रगति पथ पर
अपने अंश के
पल-पल
पाँव बढाती
फिर देख उसे
ऊँचाई पर
नीचे खड़ी
मुस्कुराती
अर्पणा माँ .........
मगर ........
न जाने क्यों ?
' मनस्वी '
अंत बेला के
अंतिम पड़ाव पर
अंतिम शब्द
अपने आत्मज़ के
सुनने को तरसती
रह जाती है
तन्हा .......
गुमसुम.....
उदास ......
वही चंचला
वही
समर्पित माँ .................. मनस्वी .....................