Saturday, 22 September 2018

मुस्कुराती आँखों में  अब नमी सी है
मनस्वी-खुश हूँ मगर कुछ कमी सी है
--------------------मीनू मनस्वी ----------------------------------

Tuesday, 5 June 2018


मीनाक्षी कपूर मीनू 

दर्द
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है दर्द में डूबा हर शब्द हमारा
अब तो है हमें बस इन्ही का सहारा
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रोयेगा जब भी ये दिल हमारा
उतारेंगे कागज़ पर हम दर्द सारा
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गरजते है बादल तो बरसती है आँखे
चुभते है दिल में फिर यादों के काँटे
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समय की धारा तो बहती रहेगी
कुछ न कुछ हमसे वो कहती रहेगी
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मगर दर्द दिल का तो बढ़ता ही जायेगा
कागज़ को यूं ही वो रंगता ही जायेगा
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फिर एक दिन *मनस्वी*ऐसा भी आएगा
जब दर्द ये हमें इस जहाँ से ले जाएगा
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उस दिन का है हमें अब इतना इंतज़ार
कि,, ख्याल एक यही अब आता है बार बार
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ऐ खुदा ! हमारी वफ़ा का कुछ सिला दे
इस दर्द से हमें अब तू मुक्ति दिला दे ,,,
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टिप्पणी ~~ एक नारी की व्यथा गाथा जिससे उसकी व्यथित मनोदशा का पता चलता है कि कोई इंसान नहीं है जो उसको समझ सके सिवाय उसकी डायरी के जो उसके दर्द की हमनवाज़ है।

Thursday, 31 May 2018

कंकाल रूपी आदमियत

कंकाल रूपी आदमियत
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देख तुझे यूँ
सहम सा गया ..
फिर अचानक
कुछ स्मृत कर
ठहर सा गया ..
कभी देखूं तुम्हे
तो कभी निहारूं
मैं खुद को..
मैं भी तो तू
आज हो नही गया..
क्यों डरूँ मैं
हाँ , क्यों डरूँ मैं तुमसे
मैं भी तू आज
तू भी तो मैं आज
हो सा गया ....
हाँ ,,, मनस्वी ,,, हाँ
बस नज़र गहराने
की देर है ,,,
फिर अंदर की
चमड़ी गलाने की
फिर क्यों डरूँ मैं
हाँ ,क्यों डरूँ मैं
मैं अब तू ,,
तू मैं हो गया
सबकी नजर
पारखी नज़र
घर संसार में
दुनियादारी में
पिसता मैं ^आदमी^
आज कंकाल सा
हो तो गया ...    ( मनस्वी )
मीनाक्षी कपूर मीनू ।सर्वाधिकार सुरक्षित है।
टिप्पणी ...आज का मानव अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी बहुत से अभावो में , प्रभावों में और मुश्किलो से गुज़ार रहा है कि चाहे अमीर हो या गरीब सबकी अपनी अपनी दोहरी ज़िंदगी है जो कहीं उसकी असलियत को कोट पैंट में तो कहीं सादा कपडों में ढकने की कोशिश करती है और कामयाब भी होती है लेकिन इस मानव मन का क्या करें वह दूसरों से तो ढके मगर खुद की नज़रों से कैसे बचें जो उसे देख रही है कंकाल की शक्ल में गलता सड़ता हुआ .. 😢  फिर भी है सभ्य शालीन मुस्कान से लिपटा हुआ ।

Saturday, 21 April 2018

फिर से वही छटपटाहट... वही अहसास ,,  भीतही सतह पर खरोंच ..रिसते घाव का अदृश्य उभार फिर उभर आया ... 
ज़िन्दगी की राह में चलते चलते कभी कभी कोई ऐसा क्षण आ जाता है जो यादों को कुरेद कर मन को आहत कर देता है और हम चाह कर भी खुद को उदास होने से रोक नहीं पाते । आज कही जब वैसा ही माहौल पाया अपनों से अपनों को बिछुड़ते पाया तो  ,,,,,,
आहत
''''''''''''':
बहुत आहत
हुआ मन ,,,,
देखा  जब
बातों ही बातों में
उड़ गए प्राण पखेरू
मिटटी हुआ तन
अचानक तेज़ झंझावात से
यूँ लगा ,,,,,,
बरसों से बंद
खिड़लिया कपाल हिलने लगे
ज़ोर ज़ोर से,,,,
और फिर मुड़ गया मन
भीतर की ओर
देखा वर्षों से चादर
तान सोई जड़ यादें
होने लगी  चेतन
यकायक ,,,,,
हाथ पकड़ किसी ने
खींच अपनी ओर
बदल दी मन की राह
और फिर चेतन अवचेतन
के बीच झूलता मन ,,,,,
बढ़ गया बाहर की ओर
मुस्कुराते हुए
फिर भी लगा
कही से चोर दृष्टि से
छुप के देख रही है
भिंची हुयी आँखे
तूफ़ान को जबर्दस्ती
रोकते हुए मानो ......
'मनस्वी ' .....
डबडबाहट को रोक
सैलाब को पी रही ,,,,,,,  :(
स्वरचित । सर्वाधिकार सुरक्षित है ।
मीनाक्षी कपूर मीनू ( मनस्वी )
एक अंश -धरा का
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
मैं ...
मैं जनित
हम...
और इसी हम से
आवर्तन
परावर्तन ,करके
बहुत आहत हुई
मैं ........
बड़ी -बड़ी शिलाएं
तम की ,
बाँध मुझ पर
दबा दिया इतना
कि मैं ,
मैं ना रही .....
बन गयी,
ऊसर ...
जो थी कभी
उपजाऊ ..
होती थी
प्रेम वृष्टि
लहलहाती थी ,
फसलें ...
हाँ --तब थी
तृप्ति ,भूख की ...
और आज ,
आज है सृष्टि ,
भूख की ..
बस
यही तो है आवर्तन ,
मन का -
जो आज काट मुझको
खा गए तुम ,
मैं ......आज
मैं ना रही ,
गल के खाक हो रही
मगर क्या ..?
इस तरह
तुम भी ना खो जाओगे ,
अन्ततः
दूँढोगे
एक पग
धरा का ' मनस्वी '
ना पाकर
खाक हो जाओगे ......' मनस्वी '
मीनाक्षी कपूर मीनू ।सर्वाधिकार सुरक्षित है ।

Wednesday, 18 April 2018

मन से ....
********
आँखों की नमी ने
हरफ़ कुछ लिख डाले 
मनस्वी ..
मन की आँखों से  
आ ....
ज़रा देख तो ले ... 
सकूं पा सकूँ तो
सुखा दूँ ...
इस नमी को भी 
मनस्वी .... . 
तू आ के 
ज़रा समेट तो ले ...
गुम गया वज़ूद .
छायाचित्र से हो गए
मनस्वी ..
आ ज़रा ..
इसे रूबरू होने तो दे .. 
स्वरचित ।सर्वाधिकार सुरक्षित है ।
मीनाक्षी कपूर मीनू (मनस्वी)

Monday, 29 May 2017

भूलना सीखो
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''मानव क्या है ...? मानव जड़ से चेतन हुई भगवान की अनमोल कृति ....लेकिन भाबनावश मानव अपनी अमूल्यता को भुला कर इस अनमोल शरीर के साथ भावनाओं का खिलवाड़ कुछ इस तरह से करता है कि ..ईश्वर प्रदत यह अमूल्यता समय से पहले या तो नष्ट हो जाती है या शारीरिक अस्वस्थता ..हमारे जीवन को कष्टदायक बना देती है .......ये कष्ट ज्यादातर हमारी भावनाओं से जुड़े है ,,,अगर हम शरीर से ,मन से ,आचरण से ,स्वस्थ होना चाहते हैं तो अस्वस्थता की सारी बातें भूलनी पड़ेगी ..चिंताएं पाल कर नहीं रखे उन्हें अंदर से निकालना पड़ेगा ..तभी मन शांत होगा ...बड़े से बड़ा संकट ,दुःख का समय , जब हमारा कोई प्रियजन हमें तडफता छोड़ मृत्यु के मुख में समां गया हो तब भी हमें उन्हें भूलना पड़ेगा ,,,दुःख की ब चिंता की बातें छोड़ उनसे लड़ने की कोशिश हमें नई जिंदगी दे सकती है ...मानती हूँ बहुत मुश्किल है लेकिन असम्भव नहीं ...शुरू में बहुत कठिनाई होगी लेकिन धीरे धीरे हम कामयाब हो जायेंगे .. और मन जब विषाक्त बातों को भूलना सीख जायेगा ...तो तन खुदबखुद अस्वस्थता का त्याग कर देगा ....तन के स्वस्थ होते ही हम अपने मन से लड़ने को ओर ज्यादा सक्षम हो जायेंगे .....इसलिए ..भूलना सीखना बहुत जरुरी है ......मैं  मनस्वी ये आपसब को ही नहीं खुद को भी कह रही हूँ ...क्योंकि यही सत्य है ,,,,,,,,  मनस्वी ,....     :)